दोस्तों, मुकेश अंबानी ने 2010 में अपना घर बनाया था एंटीला, जिसकी कीमत लगभग 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर (यानी भारत के हिसाब से करीब 8000 करोड़ रुपए) थी। अब सवाल उठता है कि जब मुकेश अंबानी की सालाना सैलरी सिर्फ 15 करोड़ रुपए है, तो उन्होंने इतना महंगा घर बनाया कैसे? क्या उन्होंने इसके लिए होम लोन लिया था? इसका जवाब है – नहीं।
असल में, मुकेश अंबानी की लग्ज़री लाइफस्टाइल का राज़ है उनकी डिविडेंड इनकम। उन्हें हर साल रिलायंस इंडस्ट्रीज़ से लगभग 2000 करोड़ रुपए का डिविडेंड मिलता है। इसी इनकम से वे अपना महंगा घर, करोड़ों का बिजली का बिल और बाकी सभी शाही खर्च पूरे करते हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी कि सिर्फ उनके घर एंटीला का बिजली का बिल ही साल 2020 में लगभग 9 करोड़ रुपए था। लेकिन जब आपकी इनकम ही हर साल हज़ारों करोड़ की हो, तो ऐसे खर्च बड़े नहीं लगते।
अब ज़रा सोचिए—अगर कोई आम इंसान बहुत अच्छी डिग्री लेकर 10 लाख रुपए सालाना पैकेज पर नौकरी करता है और मान लीजिए कि वह अपनी पूरी सैलरी बचाता है, तब भी उसे 2000 करोड़ रुपए बनाने में करीब 20,000 साल लगेंगे। यानी जहाँ एक आम इंसान कई जन्मों में भी इतनी संपत्ति नहीं कमा सकता, वहीं मुकेश अंबानी डिविडेंड इनकम से आसानी से अपनी संपत्ति बढ़ाते रहते हैं।
👉 यह अंतर दिखाता है कि रिच लोगों की असली ताकत उनकी सैलरी नहीं बल्कि उनकी इन्वेस्टमेंट और डिविडेंड इनकम होती है।
रिच लोगों का असली सीक्रेट यही है कि वे स्टॉक मार्केट और इन्वेस्टमेंट में कंपाउंडिंग का पावर यूज़ करते हैं। क्योंकि जब एक बार कंपाउंडिंग अपना मैजिक दिखाना शुरू करती है, तो आपकी वेल्थ इतनी तेज़ी से बढ़ती है कि एक आम इंसान सोच भी नहीं सकता।
इसीलिए दोस्तों, आज मैं आपको वेल्थ क्रिएशन और डिविडेंड के बारे में बहुत ही ज़रूरी बातें बताने वाला हूँ। मैं आपको समझाऊँगा कि कैसे आप इस पूरे खेल को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकते हो। साथ ही, मैं स्टॉक मार्केट और म्यूचुअल फंड्स से जुड़ी कुछ ऐसी बातें भी शेयर करूँगा, जिन्हें जानकर आप हैरान रह जाएंगे।
ये बातें शायद आपने पहले कभी कहीं नहीं सुनी होंगी और न ही किसी कहानी में पढ़ी होंगी। इसलिए इस पोस्ट को आखिर तक ज़रूर पढ़ना , क्योंकि यह एक आर्टिकल आपकी सोच और आपके फाइनेंशियल गोल्स दोनों को बदल सकता है।
ज़रा इमेजिन कीजिए—दो दोस्त हैं, रितिक और अभिषेक। दोनों ही स्टॉक मार्केट में ₹10-10 लाख का इन्वेस्टमेंट करते हैं, लेकिन अलग-अलग तरह के स्टॉक्स में।
👉 पहला दोस्त अभिषेक अपना ₹10 लाख एक हाई डिविडेंड पेइंग स्टॉक में लगाता है। इस स्टॉक से उसे अपने इन्वेस्टमेंट पर 3% डिविडेंड मिलता है और वह बिज़नेस हर साल करीब 10% की दर से ग्रो करता है।
👉 वहीं दूसरा दोस्त रितिक अपना पैसा एक ग्रोथ स्टॉक में लगाता है। इस स्टॉक से उसे डिविडेंड के रूप में सिर्फ 0.5% यानी बहुत कम रिटर्न मिलता है, लेकिन वह बिज़नेस हर साल 20% की दर से ग्रो करता है।
अब फर्क देखिए—
- पहले साल के बाद अभिषेक को अपने ₹10 लाख के इन्वेस्टमेंट पर करीब ₹30,000 डिविडेंड मिलता है।
- वहीं रितिक को उतने ही इन्वेस्टमेंट पर सिर्फ ₹5,000 डिविडेंड मिलता है।
तो अब सोचिए, लॉन्ग टर्म में किसको ज्यादा डिविडेंड इनकम मिलेगी?
असल में, यह सवाल यही बताने के लिए है कि आपको हाई डिविडेंड वाले स्टॉक्स में इन्वेस्ट करना चाहिए या फिर ऐसे ग्रोथ स्टॉक्स में जिनसे शुरू में कम डिविडेंड मिलता है लेकिन बिज़नेस की ग्रोथ तेज़ होती है।
तो दोस्तों, इस सवाल का जवाब मैं आपको थोड़ी देर में दूँगा, पोस्ट के आखिर में।
लेकिन उससे पहले, जिन लोगों को यह नहीं पता कि बिज़नेस ग्रोथ क्या होती है, हाई डिविडेंड स्टॉक और हाई ग्रोथ स्टॉक का असली मतलब क्या है, या फिर किसी बिज़नेस की ग्रोथ को कैसे कैलकुलेट किया जाता है—तो टेंशन मत लीजिए। यह सारी बातें आपको इस पोस्ट के आगे बढ़ने से पहले अच्छी तरह समझ में आ जाएंगी।
अब उससे पहले, मैं आपको एक बहुत ही इंटरेस्टिंग चीज़ बताना चाहता हूँ। आपने जरूर निफ़्टी और सेंसेक्स का नाम सुना होगा। ये दरअसल इंडेक्स होते हैं, जो हमें यह बताते हैं कि हमारी कंट्री की टॉप 30 या टॉप 50 कंपनियां किस रेट से ग्रो कर रही हैं।
दोस्तों, अब बात करते हैं शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म की।
अगर हम सेंसेक्स की बात करें, तो आज यह करीब 65,000 पॉइंट्स पर है। इसकी शुरुआत 1978 में हुई थी, उस समय इसकी बेस वैल्यू सिर्फ 100 पॉइंट्स थी। यानी पिछले लगभग 45 सालों (1978 से 2023 तक) में सेंसेक्स करीब 650 गुना बढ़ चुका है।
इसका मतलब है कि अगर किसी ने 1978 में ₹1 लाख का निवेश किया होता, तो आज उसकी वैल्यू लगभग ₹6.5 करोड़ होती।
अब आपने यह बात भी कई बार सुनी होगी कि सेंसेक्स आने वाले समय में 80,000 – 90,000 या 1,00,000 पॉइंट्स तक पहुँच सकता है। लेकिन दोस्तों, असल में सेंसेक्स पहले ही 1,00,000 पॉइंट्स टच कर चुका है।
👉 आप सोच रहे होंगे कि यह कैसे संभव है, क्योंकि गूगल पर सेंसेक्स अभी भी 65,000 दिखता है।
असल में, जो 65,000 पॉइंट्स वाला सेंसेक्स है, वह सिर्फ एक प्राइस इंडेक्स है। इसमें केवल स्टॉक्स की प्राइस ग्रोथ शामिल होती है, लेकिन डिविडेंड इनकम को नहीं जोड़ा जाता।
जबकि हम जानते हैं कि स्टॉक मार्केट से पैसा कमाने के दो तरीके होते हैं:
- प्राइस इंक्रीज़ (स्टॉक की कीमत बढ़ना)
- डिविडेंड इनकम
इसीलिए असली तस्वीर देखने के लिए हमें देखना पड़ता है सेंसेक्स टोटल रिटर्न इंडेक्स (TRI)। इसमें सिर्फ स्टॉक्स की प्राइस ही नहीं बल्कि कंपनियों द्वारा दिए गए डिविडेंड्स को भी शामिल किया जाता है।
और दोस्तों, यही वजह है कि सेंसेक्स TRI ने पहले ही 1,00,000 पॉइंट्स टच कर लिया है।
मतलब, अगर हम सिर्फ 1% डिविडेंड को भी नज़रअंदाज़ करते हैं, तो लॉन्ग टर्म में यह छोटा सा फर्क 35% एक्स्ट्रा ग्रोथ में बदल जाता है।
अब आप सोच रहे होंगे—इतना बड़ा फर्क सिर्फ 1% डिविडेंड की वजह से कैसे हो सकता है? यही है कंपाउंडिंग का असली मैजिक।
तो दोस्तों, इसका असली जवाब है पावर ऑफ कंपाउंडिंग।
कंपाउंडिंग एक्सपोनेंशियल तरीके से काम करती है, जिसे बहुत कम लोग सही मायने में समझ पाते हैं। लेकिन इस पोस्ट के आखिर तक आपको भी यह बात अच्छे से समझ में आ जाएगी।
इतना ही नहीं, एक और इंटरेस्टिंग बात है—सेंसेक्स और सेंसेक्स TRI (टोटल रिटर्न इंडेक्स) के बीच जो गैप है, वह आने वाले समय में और भी बढ़ता रहेगा।
👉 इसका मतलब है कि फ्यूचर में एक समय ऐसा आएगा जब सेंसेक्स TRI, सेंसेक्स के प्राइस इंडेक्स से डबल हो जाएगा, फिर ट्रिपल, और फिर यह अंतर लगातार बढ़ता ही जाएगा।
क्योंकि दोस्तों, सेंसेक्स TRI न सिर्फ स्टॉक्स की प्राइस ग्रोथ को काउंट करता है बल्कि डिविडेंड इनकम को भी जोड़ता है। और यही वजह है कि यह प्राइस इंडेक्स के मुकाबले कहीं ज्यादा तेज़ी से ग्रो करता है।
दोस्तों, अगर आपको अभी भी यह बात पूरी तरह समझ में नहीं आई, तो मैं आपको एक लाइव एग्ज़ाम्पल देता हूँ।
अमेरिका का एक इंडेक्स है S&P 500, जिसमें उसकी टॉप 500 कंपनियां शामिल होती हैं। लगभग 100 साल पहले यह इंडेक्स सिर्फ 8.9 पॉइंट्स पर था और आज यह 4000 पॉइंट्स के ऊपर है। यानी पिछले 100 सालों में यह करीब 500 गुना बढ़ा है।
लेकिन यह सिर्फ एक प्राइस इंडेक्स है—मतलब इसमें केवल स्टॉक्स की प्राइस ग्रोथ दिखाई जाती है, डिविडेंड्स को शामिल नहीं किया जाता।
अब अगर हम उन्हीं कंपनियों के डिविडेंड्स को भी शामिल करें, तो यही इंडेक्स पिछले 100 सालों में 500 गुना की बजाय 21,000 गुना बढ़ा है।
👉 फर्क देखिए:
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प्राइस इंडेक्स में ₹1 लाख का इन्वेस्टमेंट आज लगभग ₹5 करोड़ होता।
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लेकिन डिविडेंड्स को शामिल करने पर वही ₹1 लाख आज लगभग ₹210 करोड़ हो जाता।
यानी जहां एक तरफ 500 गुना ग्रोथ है, वहीं दूसरी तरफ 21,000 गुना। यह है डिविडेंड और कंपाउंडिंग का असली जादू।
इसीलिए मैंने कहा था कि लॉन्ग टर्म में यह अंतर और भी ज्यादा बढ़ता जाएगा। आज आप देख सकते हैं कि टोटल रिटर्न इंडेक्स (TRI) प्राइस इंडेक्स के मुकाबले पहले से ही करीब 40 गुना आगे है।
अब अगर आप S&P 500 में निवेश न भी करना चाहें, तब भी इससे हमें यह सीख मिलती है कि भारत के सेंसेक्स और सेंसेक्स TRI के बीच भी भविष्य में ऐसा ही बड़ा अंतर देखने को मिलेगा। लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर लोग हमेशा की तरह सेंसेक्स TRI को इग्नोर कर देंगे।
👉 तो दोस्तों, यह इतना बड़ा फर्क सिर्फ डिविडेंड्स की वजह से है।
अब आपको यह साफ़ समझ में आ गया होगा कि जिन छोटे-छोटे फर्कों को हम अक्सर इग्नोर कर देते हैं, वे असल में मामूली नहीं बल्कि बहुत बड़े होते हैं।
इसीलिए तो दुनिया के सबसे अमीर लोगों में से एक जॉन डी. रॉकफेलर ने कहा था:
“मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी यह है कि मैं अपने डिविडेंड्स आते हुए देखता हूँ।”
और अगर हम आज के समय की बात करें, तो दुनिया के महान निवेशकों में से एक वॉरेन बफेट को ही देख लीजिए। उन्हें सिर्फ कोका-कोला कंपनी से पिछले साल 700 मिलियन डॉलर (करीब 5,800 करोड़ रुपए) का डिविडेंड मिला।
इतना ही नहीं, उनकी कंपनी बर्कशायर हैथवे को सिर्फ 3 स्टॉक्स से पिछले साल करीब 2.75 बिलियन डॉलर (22,000 करोड़ रुपए से ज्यादा) का डिविडेंड मिला।
यानी दोस्तों, डिविडेंड इनकम ही वह ताकत है जिससे आप बिना काम किए भी लगातार पैसा कमा सकते हैं।
दोस्तों, अक्सर लोग सोचते हैं कि बस कोई स्टॉक खरीद लो, आराम से बैठो और पैसा अपने आप बन जाएगा। लेकिन असल में यह इतना सिंपल नहीं है। फिर भी, मैं आपको इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझाऊँगा ताकि सब कुछ साफ़ हो जाए।
अब वापस आते हैं उस सवाल पर, जो मैंने पोस्ट की शुरुआत में पूछा था।
👉 पहला इंसान अभिषेक अपना ₹10 लाख एक हाई डिविडेंड पेइंग स्टॉक में इन्वेस्ट करता है, जिससे उसे अपने इन्वेस्टमेंट पर 3% डिविडेंड मिलता है।
👉 वहीं दूसरा इंसान रितिक अपना ₹10 लाख एक हाई ग्रोथ स्टॉक में इन्वेस्ट करता है, जिससे उसे सिर्फ 0.5% डिविडेंड मिलता है, लेकिन वह बिज़नेस हर साल 20% की दर से ग्रो करता है।
मतलब, पहले साल में:
- अभिषेक को अपने ₹10 लाख पर 3% यानी ₹30,000 डिविडेंड मिलता है।
- वहीं रितिक को सिर्फ 0.5% यानी ₹5,000 डिविडेंड मिलता है।
अब सवाल यह है कि लॉन्ग टर्म में किसे ज्यादा डिविडेंड मिलेगा?
आपमें से कई लोगों ने सोचा होगा कि अभिषेक को ज्यादा मिलेगा, क्योंकि वह अभी 3% कमा रहा है। लेकिन सही जवाब है कि लॉन्ग टर्म में रितिक को ज्यादा डिविडेंड मिलेगा।
अब आप सोच रहे होंगे—0.5% का डिविडेंड 3% से ज्यादा कैसे हो सकता है?
👉 इसका जवाब है पावर ऑफ कंपाउंडिंग।
और अब मैं आपको समझाता हूँ कि यह कैसे काम करता है।
तो शुरुआत में भले ही अभिषेक को ज्यादा डिविडेंड मिल रहा है, जैसे पहले साल में अगर हम दोनों को कंपेयर करें तो अभिषेक को रितिक के मुकाबले छह गुना ज्यादा डिविडेंड मिलता है। लेकिन अभिषेक के बिजनेस की intrinsic growth यानी असली ग्रोथ सिर्फ 7% की रेट से हो रही थी। क्योंकि उसका बिजनेस 10% की रेट से ग्रो कर रहा है और उसमें से 3% वह डिविडेंड के रूप में ले लेता है, तो असल में कंपनी सिर्फ 7% की दर से बढ़ रही है।
दूसरी तरफ भले ही रितिक को शुरू में कम डिविडेंड मिलता है, लेकिन उसका बिजनेस 20% की रेट से ग्रो हो रहा है। इसी वजह से कुछ सालों बाद रितिक की डिविडेंड इनकम कंपाउंडिंग के पावर से तेजी से बढ़ने लगती है और धीरे-धीरे करके वह अभिषेक के बराबर आ जाती है।
लगभग 15 साल बाद दोनों की इनकम लगभग बराबर हो जाती है। लेकिन 16वें साल के बाद तस्वीर बदल जाती है। उस समय रितिक की डिविडेंड इनकम लगभग ₹92,000 हो जाती है, जबकि अभिषेक की सिर्फ ₹88,000, यानी करीब ₹3,000 कम। यहां से कंपाउंडिंग का जादू असली रूप में दिखने लगता है।
भविष्य में रितिक की डिविडेंड इनकम अभिषेक से लगातार ज्यादा होती जाती है। 30 साल बाद रितिक की डिविडेंड इनकम लगभग ₹11 लाख हो जाती है जबकि अभिषेक की सिर्फ ₹2 लाख। यानी रितिक की इनकम अभिषेक से पाँच गुना ज्यादा। शुरुआत में जहां अभिषेक की इनकम ज्यादा थी, वहीं लंबे समय में रितिक की इनकम बहुत आगे निकल जाती है।
यहां से हमें समझ आता है कि अगर आप रिटायरमेंट के लिए डिविडेंड इनकम चाहते हैं तो सिर्फ हाई-डिविडेंड स्टॉक्स का पीछा करना जरूरी नहीं है। लो-डिविडेंड लेकिन हाई-ग्रोथ स्टॉक्स से भी आप लंबी अवधि में बड़ी वेल्थ और बेहतर डिविडेंड इनकम बना सकते हो।
मतलब, इन शॉर्ट — जो स्टॉक्स 20% की रेट से ग्रो करते हैं, जैसे पिडिलाइट इंडस्ट्रीज या एशियन पेंट्स (यह सिर्फ educational purpose के लिए उदाहरण है, स्टॉक टिप नहीं), भले ही इनका डिविडेंड यील्ड सिर्फ 0.4% जैसा छोटा हो, फिर भी ये कंपनियां उन हाई-डिविडेंड स्टॉक्स से बेहतर साबित हो सकती हैं जो 7–10% का डिविडेंड देते हैं, क्योंकि इन हाई-ग्रोथ स्टॉक्स से आपकी वेल्थ भी क्रिएट होगी और डिविडेंड इनकम भी तेज़ी से बढ़ेगी।
तो इसीलिए फाइनली मैं यह कहूंगा कि भले डिविडेंड छोटे होते हैं, लेकिन वे भी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। पर इसका मतलब यह नहीं है कि आपको हाई डिविडेंड वाले स्टॉक्स में ही इन्वेस्ट करना चाहिए। असली फोकस आपको क्वालिटी वाले ग्रोथ स्टॉक्स पर करना चाहिए। भले उनसे डिविडेंड कम मिले, लेकिन समय के साथ कंपनी की ग्रोथ के कारण वही डिविडेंड बहुत ज्यादा हो जाएंगे।
बहुत सारे लोग जो स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करते हैं, वे इस छोटी-सी चीज़ को लाइफटाइम तक समझ नहीं पाते। जब भी हम डिविडेंड की बात करते हैं तो एक तरफ कुछ लोग कहते हैं कि डिविडेंड को इग्नोर करना चाहिए क्योंकि इससे आप कभी रिटायर नहीं हो सकते। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग कहते हैं कि हमें सिर्फ डिविडेंड के लिए ही इन्वेस्ट करना चाहिए और हाई डिविडेंड वाले स्टॉक्स में ही पैसा लगाना चाहिए।
लेकिन सच यह है कि दोनों ही सोच गलत है। आपको इन्वेस्टिंग करनी चाहिए ग्रोथ के लिए, और डिविडेंड को पूरी तरह इग्नोर भी नहीं करना चाहिए। जब तक आप वेल्थ बना रहे हो, तब तक डिविडेंड को रिइन्वेस्ट करना चाहिए। छोटे से डिविडेंड को भी अगर आप रिइन्वेस्ट करते हो, तो कंपाउंडिंग के पावर से वह आपकी वेल्थ को लंबी अवधि में काफी बड़ा बना देगा।
जब आपकी वेल्थ बिल्ड हो जाएगी, तब छोटा सा डिविडेंड — चाहे आधा प्रतिशत हो या 1% का — आपके रिटायरमेंट के लिए काफी होगा और आपकी लग्ज़री लाइफस्टाइल को सपोर्ट करेगा। यह वही बात है जिसे मैंने पिछले पोस्ट में FIRE स्ट्रेटेजी के हिसाब से समझाया था।
और यही कारण है कि मैंने म्यूचुअल फंड छोड़कर डायरेक्ट स्टॉक्स में इन्वेस्ट करना शुरू किया। क्योंकि म्यूचुअल फंड से आपको डिविडेंड नहीं मिलता और जो फीस आप म्यूचुअल फंड को देते हो (Expense Ratio), चाहे वह आधा प्रतिशत ही क्यों न हो, वह भी कंपाउंड होता है। लंबी अवधि में वही आधा प्रतिशत आपकी लग्ज़री लाइफस्टाइल और फाइनेंशियल फ्रीडम को प्रभावित कर सकता है।
तो मैं म्यूचुअल फंड मैनेजर को यह फीस क्यों दूं?
तो दोस्तों, आज की पोस्ट में इतना ही।
1. Compounding क्या है? (Quick Recap)
Compounding का मतलब है – आपके पैसे पर Interest मिलता है, और फिर उस Interest पर भी Interest मिलता है।
Stock Market और Dividend Investing में यही Magic आपकी Net Worth को कई गुना बढ़ा देता है।
2. Stock Market + Compounding का Connection
👉 मान लीजिए आपने ₹1,00,000 को Stock Market में Invest किया और 12% CAGR Return मिला।
- 10 साल बाद = ₹3.1 लाख
- 20 साल बाद = ₹9.6 लाख
- 30 साल बाद = ₹29.9 लाख
- 40 साल बाद = ₹93 लाख
यानी, समय जितना बढ़ता है – Compounding उतना Powerful हो जाता है।
3. Dividend + Reinvestment = Compounding Booster
Dividend सिर्फ खर्च करने के लिए मत लीजिए, बल्कि उसे Reinvest कीजिए।
👉 Example:
- आपने ₹5 लाख Dividend Paying Stocks में लगाए (5% Yield) → ₹25,000 Dividend/साल मिला।
- अगर आपने इस Dividend को Reinvest किया और Average 12% Return मिला → 20–25 साल में यह Portfolio 1 करोड़ से ज्यादा बन सकता है।
यानी, Dividend Reinvestment Plan (DRIP) Compounding की Speed को दोगुना कर देता है।
4. Dividend Compounding के फायदे
- Regular Income + Growth (दोनों साथ)
- Market गिरने पर भी Cash Flow
- Reinvestment करने पर Portfolio तेजी से बढ़ता है
- Long Term में Financial Freedom सुनिश्चित
5. Compounding से Financial Freedom Formula
👉 Simple Steps:
- जल्दी Invest करना शुरू करें (Age 20–30 सबसे Best)
- Consistent SIP + Dividend Stocks में Invest करें
- Dividend Reinvest करना न भूलें
- Portfolio को कम से कम 10–15 साल तक Hold करें
6. Indian Context – Dividend Compounding Examples
- ITC → 20 साल पहले ₹1 लाख लगाने पर + Dividend Reinvest करने पर आज ₹50 लाख से ज्यादा Value
- Coal India, Power Grid, ONGC → High Dividend Paying Companies (Stable Cash Flow)
- HDFC Bank, Infosys, TCS → Growth + Dividend दोनों का Magic
Action Step (आज ही करें)
- Dividend Paying Stocks की List बनाइए
- Auto-SIP + Dividend Reinvestment सेट कीजिए
- Portfolio को हर 6 महीने Review कीजिए, लेकिन जल्दी बेचिए मत
- Minimum 10 साल Compounding को Time दीजिए
निष्कर्ष
Compounding + Stock Market + Dividend Reinvestment = Financial Freedom का Shortcut 🚀
अगर आप Discipline बनाए रखते हैं, तो 15–20 साल में आपकी Dividend Income आपकी Monthly Salary से भी बड़ी हो सकती है।
👉 यही है FIRED Movement की Real Power!
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